Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 2
पहला सर्ग समाप्त दूसरा सर्ग आहिक कर्मनुष्ठान, श्रीरामचन्द्रजी का सुनी हुई वार्ताओं का चिन्तन तथा सुने हुए पदार्थो में स्थिरता के लिए बुद्धि आदि की प्रार्थना करना ।
19 verse-groups
- Verse 1चन्द्रमा के तुल्य कान्तिवाले उन राजपुत्रो ने साथ साथ घर जाकर अपने अपने भवनों में भलीभाँति…
- Verses 2–8श्रीवसिष्ठजी, श्रीरामचन्द्रजी, अन्यान्य राजाओं, मुनियों ओर द्विजातियों ने अपने घरों मे, ग…
- Verse 9तदनन्तर उन्होने भलीर्भाति सन्ध्यावन्दन किया, अघमर्षण मन्त्रों का जप किया, पवित्र स्तोत्र…
- Verses 10–11तदुपरान्त कान्त के संगम से कामिनियों के शोक का नाश करनेवाली तथा चन्द्रमा ओर तुषार को देने…
- Verses 12–15तदुपरान्त श्रीरामचन्द्रजी को छोडकर ओर लोगों की उस समय के उचित विषयभोग, निद्रा आदि व्यवहार…
- Verse 16इस माया के निवृत्त होने से क्या गुण होता है ? अथवा सम्पूर्ण भोग्य, भोक्ता और भोग की निवृत…
- Verse 17भगवान श्रीवसिष्ठजी ने मन के क्षय के लिए क्या साधन और फल कहा है अथवा आत्मा के विज्ञात होने…
- Verses 18–20जीव, चित्त, मन, माया इत्यादि फैले हुए रूपों से आत्मा ही इस मिथ्याभूत संसार का विस्तार करत…
- Verse 21यदि कोई शंका करे, विचार से क्या प्रयोजन है, भोगो का ही त्याग कीजिये तो इस पर कहते हैं। भो…
- Verse 22दूसरा संकट भी कहते हैं। इस अवश्य प्राप्तव्य आत्मतत्त्व में मन ही प्रमाण है और यह बाहरी वि…
- Verse 23यदि सब विषयों की निवृत्ति होने पर भी एकमात्र ब्रह्माकारता का अवलम्बन करके वासनारहित मन को…
- Verses 24–30पदों में शोक रहित होकर कब निवास करूँगा ? मेरा बड़ा भारी संसाररूपी ज्वर कब नष्ट होगा ? उसन…
- Verses 31–32गरुड जैसे सागर को अनायास पार कर जाता हैं, वैसे ही मेरी इन्द्र्यो विषयों की अवहेलना से दुः…
- Verse 33उत्कट मोक्षेच्छा से स्वर्ग भी मुझे तृण के समान मालूम पड़ता है, ऐसा कहते हैं। नन्दनवन में…
- Verses 34–35अब विवेक ग्रहण के लिए मन आदि की प्रार्थना करते हैं। हे मन, कहो तो सही, वीतराग पुरुषों द्व…
- Verse 36हे बुद्धि, हे बहन (४) मैं तुम्हारा भाई हूँ मेरी प्रार्थना को तुम जल्दी पूरी करो | हम दोनो…
- Verse 37हे साध्वि, हे पुत्रि, (=) हे सन्मते, हे भव्ये, तुम्हारे पैर पड़कर प्रेम से मैं प्रार्थना…
- Verses 38–39इस प्रकार प्रार्थना द्वारा सावधान की गई बुद्धि को वैराग्य-प्रकरण आदि चार प्रकरणों के अर्थ…
- Verse 40यदि कोई शंका करे कि मन की पहले प्रार्थना की गई है, उसी से चारों प्रकरणों के अर्थके अवधारण…