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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verses 18–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 18-20

संस्कृत श्लोक

जीवश्चित्तं मनो मायेत्येवमादिभिराततैः । रूपैरात्मैव संसारं तनोतीममसन्मयम् ॥ १८ ॥ एभिरेवं मनोमात्रतन्तुबद्धैः क्षयं गतैः । दुःखोपशान्तिरेतानि सुचिकित्स्यानि नः कथम् ॥ १९ ॥ भोगाभ्रमालावलयां धीबलाकामिमां कथम् । पृथक्करोमि पयसो धारां हंस इवाम्भसः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जीव, चित्त, मन, माया इत्यादि फैले हुए रूपों से आत्मा ही इस मिथ्याभूत संसार का विस्तार करता है एवं एकमात्र मन रूप तन्तु में बंधे हुए इनका क्षय होने से दुःखनिवृत्ति सिद्ध होती है। मायारूप ये सब हम लोगों के द्वारा कैसे भली-भाँति चिकित्सा योग्य होंगे ? विषयरूपी मेघों का (विषय ही संसाररूप से घन बन कर चित्ताकाश को आवृत करने के ओर दुःखों की हजारों धाराओं को वषनि के कारण मेघ के सदृश हुए) अनुसरण कर माला के समान घेरनेवाली अपनी बुद्धिवृत्तिरूपी इस बकपंक्ति को जैसे हंस जल से दूध का भाग अलग कर देता है वैसे ही मैं कैसे पृथक्‌ करूँ २