Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verses 31–32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 31,32
संस्कृत श्लोक
कदेन्द्रियाणि दुःखेभ्यः संतरिष्यन्ति हेलया ।
दुरीहादग्धदेहानि गरुत्मन्त इवार्णवान् ॥ ३१ ॥
अयं सोऽहं रुदन्मूढ इति व्यर्थाहितो भ्रमः ।
शरदीवासितो मेघः कदा नाशमुपैष्यति ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
गरुड जैसे सागर को अनायास पार कर जाता हैं, वैसे ही मेरी इन्द्र्यो
विषयों की अवहेलना से दुःखों को दूर करने के लिए दुष्ट अभिलाषा से होनेवाले विविध भावी शरीरो को
कब पार कर जायेगी ? पशु, पुत्र, धन, अन्न, पान आदि की अप्राप्ति और वियोग से रो रहे मुझ मूढ़ में
रोदन का कारणभूत यह देह ही वह प्रसिद्ध आत्मा मैं हूँ, इस प्रकार का पूर्व-पूर्व देहों की वासना और
काम-कर्म परम्परा से उत्पन्न व्यर्थ भ्रम प्रबोधरूप विमलता की प्राप्ति होने पर शरत्काल में मेघ की
तरह कब नाश को प्राप्त होगा ?