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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, Verses 34–35

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 2, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 2 · श्लोक 34,35

संस्कृत श्लोक

वीतरागजनप्रोक्ता निर्मला ज्ञानदृष्टयः । कच्चित्पदं त्वयि मनः करिष्यन्तीति मे वद ॥ ३४ ॥ हा तात मातः पुत्रेति गिरामासामहं पुनः । भाजनं चित्त माभूवं भोजनं दुःखभोगिनाम् ॥ ३५ ॥

हिन्दी अर्थ

अब विवेक ग्रहण के लिए मन आदि की प्रार्थना करते हैं। हे मन, कहो तो सही, वीतराग पुरुषों द्वारा उपदिष्ट निर्मल ज्ञानदृष्टियाँ क्या तुममें स्थिति करेगी ? हे चित्त, मैं दुःखरूपी अजगरों का भोजन होकर हा तात, हा मातः, हा पुत्र - इन रोदनों का भाजन फिर नहोऊँ