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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 17

19 verse-groups

  1. Verse 1सत्रहवाँ सर्ग जिस प्रकार के निश्चयों से युक्त जीवन्मुक्त पुरुष बन्धन में नहीं पड़ता ओर अज…
  2. Verse 2यदि कोई कहे, जीवन्मुक्तो में यदि तत्तद्‌ वर्णाश्रम के उचित कर्मफलो में तृष्णा है, ते अज्ञ…
  3. Verse 3संसार सत्य है, इस बुद्धि से जिसके द्वारा भोगों में उत्साह दृढ हो गया है, ऐसी तृष्णा से प्…
  4. Verse 4भोग्य पदार्थों में “ये मिथ्या है" इस निश्चय से हृदय मेँ भोगसंकल्परहित और एकमात्र लोक संग्…
  5. Verse 5हे श्रीरामचन्द्रजी, बाह्य विषयों में जो लम्पटता से बढ़ी-चढ़ी तृष्णा है वह बद्ध कहलाती है।…
  6. Verse 6विषयप्राप्ति के पहले और अन्त में रागविहार आदि के कारण तृष्णा की जो दुःख शून्यता थी, वही श…
  7. Verses 7–9हे महामते श्रीरामचन्द्रजी, यह मुझे प्राप्त हो, इस प्रकार की हृदय में जो भावना है, उसे आप…
  8. Verses 10–12हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, अजर, अमर आत्मा को जानकर आप जरा व मरण की शंका…
  9. Verses 13–15आशा के त्याग में उपाय बताते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, यह पदार्थरूपी दृश्य आपका नहीं है और…
  10. Verses 16–17हे रघुवर, जगत के सब पदार्थो का स्वरूपभूत अविनाशी मैं ही सब कुछ हूँ इस प्रकार का तीसरा निश…
  11. Verse 18इन निश्चयों में पहला निश्चय बन्धन के लिए कहा गया है, शुद्ध भावना से उत्पन्न हुए शेष तीन म…
  12. Verse 19यदि कोई शंका करे, तृष्णा भेद के निरूपण के अवसर पर इस विभाग की क्या आवश्यकता है ? तो इस पर…
  13. Verse 20उनमें तीसरे निश्वय का प्रयोजन कहते हैं। हे महामते, सर्वात्मा मैं ही सब कुछ हूँ, इस प्रकार…
  14. Verse 21आत्मा की महिमा ऊपर-नीचे-तिरछे सर्वत्र है, सभी आत्मा है, इस प्रकार के उस आन्तरिक निश्चय से…
  15. Verses 22–25(चौथा निश्चय शून्यवादी के मत में प्रविष्ट है, इस शंका का निवारण करते हुए कहते हैं ।) परिश…
  16. Verse 26जैसे कड़ा, बाजुबन्द, नूपुर आदि सुवर्ण से पृथक्‌ नहीं है, वैसे ही वृक्ष, तृण आदि करोड़ों आ…
  17. Verse 27तो जल-समुद्र आविरूप जगत में भेदाभेद प्रतीति कैसे होती है ? इस पर कहते हैं । परमात्ममयी अद…
  18. Verses 28–31हे श्रीरामचन्द्रजी, स्वकीय अथवा परकीय पुत्र-मित्र आदि सारे जगत के वृद्धि को प्राप्त होने…
  19. Verses 32–34मुझे किस प्रकार व्यवहार करना चाहिये, इस पर कहते है । ब्रह्म के तुल्य ही आप परमार्थतः सत्त…