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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । विदेहमुक्ता ये राम ते गिरामिह गोचरे । नैव तिष्ठन्ति तस्मात्त्वं जीवन्मुक्तिमिमां श्रृणु ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सत्रहवाँ सर्ग जिस प्रकार के निश्चयों से युक्त जीवन्मुक्त पुरुष बन्धन में नहीं पड़ता ओर अज्ञ बंधन में पड़ता है, उनके विभाग का पुनः वर्णन | श्रीरामचन्द्रजी के गितो से इन्हे विदेहमुक्त का लक्षण जानने की इच्छा है, यह ताड़कर एकरूप से उसके लक्षण आदि का अभाव होने से वहाँ पुरुषों के कुण्ठीभाव कथन से ही निरतिशय, स्वप्रकाश, भूमानन्द का परिशेष ही विदेहमुक्ति का स्वरूपलक्षण है, यह सूचित करते हुए जीवन्मुक्ति लक्षणों में ही अवश्य उपादेय विशेषो को कहने के लिए वतिष्ठजी प्रतिज्ञा करते है। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जो लोग विदेह मुक्त हैं, वे वाणी के विषय हो ही नहीं सकते, इसलिए आप इस जीवन्मुक्ति को सुनिये