Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verses 7–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, verses 7–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 7-9

संस्कृत श्लोक

इदमस्तु ममेत्यन्तर्यैषा राघव भावना । तां तृष्णां शृङ्खलां विद्धि कलनां च महामते ॥ ७ ॥ तामेतां सर्वभावेषु सत्स्वसत्सु च सर्वदा । संत्यज्य परमोदारः परमेति महामनाः ॥ ८ ॥ बन्धाशामथ मोक्षाशां सुखदुःखदशामपि । त्यक्त्वा सदसदाशां च तिष्ठाक्षुब्धमहाब्धिवत् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे महामते श्रीरामचन्द्रजी, यह मुझे प्राप्त हो, इस प्रकार की हृदय में जो भावना है, उसे आप तृष्णारूपी और कलनारूपी श्रृंखला जानिये । उस तृष्णा का सत्‌ ओर असत्‌ पदार्थों में सदा त्याग कर परम उदार और महामना पुरुष जीवन्मुक्ति पद को प्राप्त करता है । देह आदि बंधन की आशा का, देह आदि की निवृत्ति की आशंका, (& ) सुख-दुःखदशा का और सत्‌-असत्‌ की आशा का भी त्याग कर प्रशान्त महासागर (& ) बन्ध मिथ्या है, ऐसा निश्चय होने पर बन्ध की निवृत्ति के प्रार्थनीय न होने के कारण उसमें आशा त्याग स्वाभाविक है, क्योंकि जागता हुआ कोई पुरुष स्वप्न के निगड़बन्धन से छुटकारा पाने की आशा नहीं रखता। की तरह आप स्थित होइये