Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verses 13–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 13-15
संस्कृत श्लोक
अन्यच्च राम मनसि पुरुषस्य विचारिणः ।
जायते निश्चयः साधो स्फाराकारश्चतुर्विधः ॥ १३ ॥
आपादमस्तकमहं मातापितृविनिर्मितः ।
इत्येको निश्चयो राम बन्धायासद्विलोकनात् ॥ १४ ॥
अतीतः सर्वभावेभ्यो वालाग्रादप्यहं तनुः ।
इति द्वितीयो मोक्षाय निश्चयो जायते सताम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
आशा के त्याग में उपाय बताते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह पदार्थरूपी दृश्य आपका नहीं है और आप भी यह नहीं है, यह परमार्थतत्त्व
से अन्य ही कुछ है और आप भी इससे अन्य ही हैं। असत् उदित हुए इस असत् विश्व के सत् की तरह
स्थित होने पर और आपके उक्त विश्वता का अतिक्रमण करने पर तृष्णा का सम्भव ही कहाँ हो सकता
है? ॥११,१२।॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, विचारवान पुरुष के हृदयमें चार प्रकार का विस्तृत निश्चय होता है,
उसे भी आप सुनिये । पैर से लेकर सिर तक मैं माता-पिता द्वारा निर्मित हूँ, इस प्रकार का एक निश्चय
है, है श्रीरामचन्द्रजी, असत्दर्शन उक्त निश्चय बन्ध के लिए है। मैं देह, इन्द्रिय आदि सब पदार्थों से
परे, बाल के अग्रभाग से भी सूक्ष्म हूँ, ऐसा दूसरा निश्चय सज्जनों के मोक्ष के लिए होता हे