Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verses 32–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
नैवाहमस्ति नच नाम जगन्ति सन्ति सर्वं च विद्यत इदं ननु निर्विकारम् ।
विज्ञानमात्रमवभासत एव शान्तं नासन्न सज्जगदिदं च सदेति विद्धि ॥ ३२ ॥
परममृतमनाद्यं भासनं सर्वभासामजरमजमचिन्त्यं निष्कलं निर्विकारम् ।
विगतकरणजालं जीवनं जीवशक्तेः सकलकलनहीनं कारणं कारणानाम् ॥ ३३ ॥
सततमुदितमीशं व्यातते चित्प्रकाशे स्थितमनुभवबीजं स्वात्मभावोपदेश्यम् ।
स्वदनमनुचितोऽन्तर्ब्रह्म सर्वं सदैव त्वमहमपि जगच्चेत्यस्तुते निश्चयोन्तः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
मुझे किस प्रकार व्यवहार करना चाहिये, इस पर कहते है ।
ब्रह्म के तुल्य ही आप परमार्थतः सत्ता द्वैतात्मक ही होकर व्यवहारकाल में भी भावना द्वारा अद्वैत
का ही आश्रय कर तत्-तत् प्राणियों के कर्मफल देने के समय ब्रह्म के सदृश ही वर्ण-आश्रमधर्म
व्यवस्थापन के विषय मेँ द्वैत का सर्वथा अनादर कर सर्वथा व्यवहार करते हुए यथा योग्य द्वैत-अद्वित
परायण होइये, भाव यह है कि अद्वैत में कर्मों की ही सिद्धि न होने के कारण एकरूपता से सर्वत्र कथंचित
अद्रैताचरण करने पर जगत की व्यवस्था तथा धर्मशास्त्र आदि का बाध होगा, इसलिए वहाँ पर द्वैत का
आश्रय ही उचित हे । हे श्रीरामचन्द्रजी, आप पदार्थो की विविध आँधी से भीषण उत्पातो से भरी हुई
जन्म भूमिय में, उत्पातपूर्ण गर्तो मेँ हाथी के समान, मत गिरिये ॥ २९ , ३ ०॥ परमार्थतः द्वैत का सम्भव
ही नहीं है, क्योकि वह चित्त से कल्पित ही है वास्तविक नहीं हे । अन्यवादियों ने भी द्वित्व की अपेक्षा
बुद्धि से उत्पत्ति तथा उपेक्षाबुद्धि के नाश से नाश माना ह । इसी प्रकार आत्मा में एकत्वनामक संख्या
गुण भी नहीं हो सकता, क्योकि वह भी द्वित्व आदि के व्यावर्तकत्वरूप से ही कल्पित होने के कारण
द्वित्व से ही उदित हुआ है अतएव अद्वैत, एेक्य से भी रहित, अपनी सिद्धि में अन्य की अपेक्षा न रखने
के कारण सदा उदित, सन्मात्र ब्रह्म ऐक्य के निरास से सर्वरूप है ओर द्वित के निरास से कुछ भी नहीं है,
क्योंकि "तस्मात्तत् सर्वमभवत्" नेह नानास्ति किंचन" इत्यादि श्रुतियाँ और उसके अनुभव करनेवाले
ज्ञानी जन ऐसा कहते हैं ॥३ १॥
न तो “अहम् है और न जगत ही है; किन्तु यह सब निर्विकार, विज्ञानमात्र ही है, उसके
साक्षात्कारमात्र से शान्त हुए इस जगत को सदा न तो असत् और न सत् जानिये । परम, अमृत,
अनादि, सब ज्योतियों को भासित करनेवाला, अजर, अज, अचिन्त्य, निष्कल, निर्विकार, सब इन्द्रियों
से रहित, प्राण के भी प्राणन में निमित्तभूत, सब कलनाओं से रहित, कारणों के भी कारण, सदा उदित
ईश्वर, फैले हुए चिदाकाश में स्थित, अनुभवों के बीजस्वरूप, स्वरूप स्थिति द्वारा उपदेश देने के
योग्य, आन्तरानन्दैकरस ब्रह्म ही तुम, मैं और जगत है उससे भिन्न कुछ नहीं है, इस प्रकार का निश्चय
तुम्हारे हृदय मेँ हो