Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 17, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
प्राकृतान्येव कर्माणि यया वर्जितवाञ्छया ।
क्रियन्ते तृष्णयेमानि तां जीवन्मुक्ततां विदुः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई कहे, जीवन्मुक्तो में यदि तत्तद् वर्णाश्रम के उचित कर्मफलो में तृष्णा है, ते अज्ञानियों
की तरह ही उन कर्मफर्लो के भोग के लिए उनको भी देहरूप बन्धन प्राप्त होगा । यदि उनमें तत्तद्
वर्णाश्रम के उचित कर्मफलो में तृष्णा नहीं है, तो उनकी उन कर्मों में प्रवृत्ति ही नहीं होगी, क्योकि
श्रयोजनमनुदिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्तते” ऐसा न्याय है, इस दोष का परिहार करने के लिए ज्ञानी ओर
अज्ञानी की कर्म में प्रवृत्ति करानेवाली शुद्ध ओर अशुद्ध तृष्णा की विलक्षणता का उपपादन करते है।
विषय के आस्वादन में उत्साहरहित जिस तृष्णा से तत्-तत् वर्णाश्रम के स्वभाव से प्राप्त किये गये
ये कर्म किये जाते हैं, उस तृष्णा को जीवन्मुक्तता कहते हैं