Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 15
22 verse-groups
- Verses 1–2पन्द्रहवाँ सर्ग चित्तता को प्राप्त हुआ आत्मा जिससे संसार में बँधता है, अनर्थबीजों से पूर्…
- Verse 3वह राग-द्वेषवासनारूप मल को धारण करे, उससे क्या ? ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं । प्र…
- Verse 4जैसे आकाश में मेघगर्जन, वृष्टि आदि अनेक विकार करनेवाली वर्षा ऋतु की अँधेरी रात जब-जब उदित…
- Verses 5–6महादेव आदि देवता प्रलयकाल की अग्नि की ज्वालाओं के संताप को सहने के लिए समर्थ हैं किन्तु त…
- Verse 7हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार में जो ये दुर्निवार, दुःख से दूर करने के अयोग्य बड़े बड़े दुःख…
- Verse 8मनरूपी बिल में छिपी हुई यह तृष्णारूपी भेड़िया अदृश्य होकर ही मनुष्यों के शरीर से मांस, हड…
- Verse 9जड़ तृष्णा जलमय वर्षा ऋतु की नदी के समान क्षणभर में वृद्धि को प्राप्त होती है, क्षणभर में…
- Verse 10मूर्छा ही देती है, ऐसा जो पहले कहा था, उसी का विवरण करते हैं। तृष्णा से पीड़ित पुरुष जो द…
- Verses 11–12तृष्णा का नाश होने पर सब दुःख निवृत्त हो जाते है, सव पुण्यों का उदय होता है, ऐसा कहते हैं…
- Verse 13जो पुरुषरूपी वृक्ष तृष्णारूपी घुनों से घुन नहीं गया, वह सदा पुण्यरूपी फूलों से प्रफुल्लित…
- Verses 14–15विवेकरहित पुरुषों के चित्तरूपी अरण्य में अनन्त व्याकुलतारूप कल्लोलों से युक्त ओर भ्रान्ति…
- Verses 16–17निर्दय चित्त से कर्कश तृष्णा कुल्हाड़े की धार के समान शीघ्र गिरती हुई धर्म और ज्ञान के मू…
- Verse 18बुढ़ापा कितना ही जोर-शोर का क्यो न हो, पर वह नेत्रं को उतना अन्धा नहीं बनाता, जितना कि हृ…
- Verse 19हृदय में स्थित उल्लूरूप अमंगलभूत तृष्णा से, जो हृदय में घोंसला बना चुकी हो उससे, भगवान वि…
- Verse 20ईश्वर से प्रयुक्त या देवभोग्य सुखलेश विषयिणी रज्जु की तरह हृदय में गुँथी हुई इस अलोकिक तृ…
- Verse 21जिसका आकार सर्वदुःखमय है एवं जो जगत के सब लोगों के जीवन का नाश करती है, ऐसी तृष्णा का क्र…
- Verse 22सारा संसार व्यवहार तृष्णा से ही होता है, इस आशय से कहते हैं। तृष्णा से ही वायु बहती है, त…
- Verse 23यह सारी लोक-यात्रा तृष्णारूपी रज्जु से बँधी हुई है, रज्जुबन्धन से तो लोग मुक्त हो सकते है…
- Verse 24इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, संकल्प त्याग से आप तृष्णा का त्याग कीजिये । संकल्पहीन मन नहीं ह…
- Verse 25हे महाबाहो, पहले आप अपने चित्त में तुम, मैं, यह, इस दुराशा का अर्थात् सब दुराशाओं के निम…
- Verse 26हे श्रीरामचन्द्रजी, यदि आप दुःख को उत्पन्न करनेवाली अनात्मा में आत्मभावना की भावना न करेग…
- Verse 27हे श्रीरामचन्द्रजी, इस अपवित्र अहंभावमयी तृष्णा को अनहंभावरूप कैंची से काटकर आप सम्पूर्ण…