Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verses 5–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 5,6
संस्कृत श्लोक
कल्पानलशिखादाहं सोढुं शक्ता हरादयः ।
तृष्णानलशिखादाहं सोढुं शक्ता न केचन ॥ ५ ॥
तीक्ष्णा कृष्णा सुदीर्घा च वहत्यङ्गं सदा निजम् ।
शीतलैवासुखोदर्का घोरा तृष्णाकृपाणिका ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
महादेव आदि देवता प्रलयकाल की अग्नि की ज्वालाओं के संताप को सहने के लिए
समर्थ हैं किन्तु तृष्णारूपी अग्नि की ज्वालाओं के संताप को सहने के लिए समर्थ नहीं हैं । तीखी,
काली, दीर्घ और घोर तृष्णारूपी तलवार, जो शीतल होती हुई भी उत्तरकाल में दुःख देनेवाली है,
अपने अंग को सदा काटती है