Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
दृष्टदैन्यो हतस्वान्तो हतौजा याति नीचताम् ।
मुह्यते रौति पतति तृष्णयाभिहतो जनः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
मूर्छा ही देती है, ऐसा जो पहले कहा था, उसी का विवरण करते हैं।
तृष्णा से पीड़ित पुरुष जो दीनता का भोगकर चुका, जिसका हृदय नष्ट हो गया एवं जिसका तेज
चला गया, नीचता को प्राप्त होता है, घबराता है, रोता है और गिरता है