Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
अनन्ताकुलकल्लोला विवर्तावर्तसंकुला ।
प्रवहत्याशयारण्ये तृष्णान्धानां नदी नृणाम् ॥ १४ ॥
तृष्णयेमे जनाः सर्वे सूत्रयन्त्रपतत्रिवत् ।
भ्राम्यन्ते प्रविशीर्यन्ते संह्रियन्ते च भूरिशः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकरहित पुरुषों के चित्तरूपी अरण्य में अनन्त व्याकुलतारूप कल्लोलों से
युक्त ओर भ्रान्तिरूपी भँवरियों से ठसाठस भरी हुई तृष्णारूपी नदी बहती है । तृष्णा द्वारा ये सब
लोग धागे से वैधे हुए पक्षी के तुल्य पहले धनप्राप्ति के लिए देश-विदेश में घुमाए जाते हैं, तदनन्तर
धन की रक्षा, व्यय, नाश आदि की चिन्ता और शोक से जर्जरित किये जाते हैं और अन्त में मारे
जाते हैं