Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
वर्धमानमहामोहदायिनी भयकारिणी ।
तृष्णा विषलतारूपा मूर्च्छामेव प्रयच्छति ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह राग-द्वेषवासनारूप मल को धारण करे, उससे क्या ? ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर
कहते हैं ।
प्रतिदिन बढ़ रहे महामोह को देनेवाली, भय देनेवाली और हजारों मरण, मूर्छा और भ्रान्तियों
की हेतु होने से विषलतारूप तृष्णा राग-द्वेषवासनारूपी मल को धारण करनेवाले आत्मा के लिए
मूर्छा ही देती है, सुख का लेश भी नहीं देती