Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
नोन्मत्तापि जरा चक्षुस्तथा जरयति क्षणात् ।
यथा जरयति क्षामा तृष्णा हृदयरूपिका ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
बुढ़ापा कितना ही जोर-शोर का क्यो न हो,
पर वह नेत्रं को उतना अन्धा नहीं बनाता, जितना कि हृदय की पिशाचीरूप कृश तृष्णा अन्धा
बनाती है