Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 15, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एतामनुसरन्राम चित्तसत्तामपावनीम् ।
संसारबीजकणिकां जीवबन्धनवागुराम् ॥ १ ॥
आत्मा त्यक्तात्मरूपाभो मलिनामाप तद्दृशम् ।
चित्तं समनुसंधत्ते धत्ते च कलनामलम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
पन्द्रहवाँ सर्ग
चित्तता को प्राप्त हुआ आत्मा जिससे संसार में बँधता है,
अनर्थबीजों से पूर्ण उस विचित्र तृष्णा का वर्णन ।
चित्त का नाश होने पर परमपुरुषार्थ प्राप्ति की ही गयी है, इस चित्त का अनुसरण करने पर तृष्णा
की अभिवृद्धि से अनर्थो की परम्परा प्राप्त होती है, यह दशनि के लिए भूमिका बधते है।
हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार की बीजकणरूप, जीवों के बन्धन के लिए जालस्वरूप अपवित्र इस
चित्तसत्ता का अनुसरण कर रहे आत्मा जिसने अपना ब्रह्मात्मरूपता का त्याग कर दिया, अविद्या से
आच्छन्न ज्ञान को, जिसकी अभिव्यक्ति इन्द्रियवृत्तियों की अधीन है, प्राप्त कर रहे चित्तके ही अनुरोध
से चित्तकल्पित देहादि संघात ही मेँ हूँ, ऐसा अनुसंधान करता है और चित्त से प्राप्त किये गये नाना
विषयों की कल्पना से होनेवाले राग-द्रेषवासनारूप मल को धारण करता है