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Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 55

27 verse-groups

  1. Verses 1–2प्रचपनवाँ सर्ग पूजित श्रीवसिष्ठ का दाशूर के साथ वार्तालाप, कदम्ब शोभा का दर्शन और प्रातःक…
  2. Verses 3–4वहाँ पर मैंने जैसे तेज से अग्नि युक्त रहती हे वैसे ही बड़ी भारी तपस्या से युक्त ओर इन्द्र…
  3. Verse 5मुझे आया हुआ देखकर दाशूर ने आसन देकर अर्घ्य एवं फल, पत्र, पुष्प आदि से मेरी पूजा की
  4. Verse 6तदनन्तर उस दाशूररूपी सूर्य के साथ पहले से प्रस्तुत ब्रह्मचर्चा मैंने की जो उनके पुत्र को…
  5. Verses 7–9मैंने उस कदम्ब वृक्ष को देखा, जिसके खोखले कलियां से व्याप्त थे, और जो दाशूर की इच्छा से क…
  6. Verse 10हिमकणों की पंक्तिरूपी मुक्तावली से वह अलंकृत था । निर्मल फूलों के समूह से उसका सर्वाग भरा…
  7. Verse 11अपने परागरूपी चन्दन के लेप से वह जड से लकेर चोटी तक लिप्त था और अपने पल्लवो के विस्तार से…
  8. Verse 12मानों विवाह के लिए पुष्पों के भार से भरे हुए, लतारूपी अंगना से संयुक्त उसने नागरिक वेष से…
  9. Verse 13मुनियों से बनाई हुई पर्णशालाओं के आकार के तुल्य लतामण्डपों से वह विभूषित था तथा महोत्सव क…
  10. Verse 14मृगो के खुजलाने से उत्पन्न कम्पसे गिरी हुई पुष्पधुनियों से वह धूसरित था अपने विस्तार के आ…
  11. Verse 15फूलों से गिरी हुई पुष्पधूलियों से लाल हुए मयूरो से वह ऐसा प्रतीत होता था मानों पर्वतो ने…
  12. Verses 16–20अब “अलिनेत्रेण भासिना" यहाँ तक के श्लिष्ट विशेषणो से विलासी पुरुषरूप से कदम्ब या वसन्त अथ…
  13. Verses 21–22हिमकणों से जिनका रतिश्रम शान्त हो गया था, मद से अलसाए हुए, पुष्पों की धूलि से सने हरे, पर…
  14. Verse 23उसने दिशाओं में नीली मक्खियों की सुन्दरध्वनियों से निवेदित हुए-से वनोपान्तरूपी नगरी के मृ…
  15. Verses 24–25पल्‍लवों में, जो तकिये के तुल्य थे, निद्रावश अथवा चपलता से क्षण भर रक्खे हुए दर्शनीय सिरव…
  16. Verses 26–27घोंसलों में साँस ले रहे पक्षी मुनि के प्रभाव से नि:शंक होकर सोने के कारण नहीं दिखाई देते…
  17. Verse 28पल्लवो से सुशोभित घोंसलों से उसका सारा भाग काला हो गया था और जड़ की भूमि पर धूलिकदम्बों स…
  18. Verses 29–30बहुत क्या कहूँ, उस वृक्ष में ऐसा एक भी पत्ता न था, जिस पर कोई जीव न रहता हो ओर किसी के उप…
  19. Verse 31इस प्रकार के गुणों से युक्त उस कदम्ब वृक्ष को दिव्यदृष्टि से देख रहे मेरी वह अँधेरी रात्र…
  20. Verse 32उस पुत्र को पुनः परम ज्ञान का बोध करा दिया
  21. Verse 33हम दोनों की आपस की विविध कथाओं से वह रात्रि इस प्रकार मुहूर्त की भाँति व्यतीत हुई, जैसे क…
  22. Verses 34–35प्रातःकाल अप्सराओं के अंगभाग की तरह सुशोभित, पुष्पशोभा के निविड समूह के सदुश तारामण्डल के…
  23. Verse 36वहाँ अपने अभीष्ट स्थान को पाकर ओर आकाशतल मेँ जाकर और आकाश में प्रविष्ट होकर मैं सप्तर्षिय…
  24. Verse 37हे रघुनन्दन, यह दाशूर की आख्यायिका, जो सत्य-सी होती हुई भी जगत के प्रतिबिम्ब की तरह असन्म…
  25. Verse 38हे श्रीरामचन्द्रजी, जगत स्वरूप के निरूपण के सिलसिले में यह जगत दाशूर की आख्यायिका के तुल्…
  26. Verse 39इसलिए ज्ञानी की दृष्टि से अवास्तविक, अज्ञानी की दृष्टि से चाहे यह वास्तविक ही क्यों न हो,…
  27. Verse 40इसलिए विकल्प, उसके आश्रयरूप मन और उसके हेतुभूत अज्ञान को दूर करके आप निर्मल आत्मतत्त्व का…