Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 26–27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 26, 27

संस्कृत श्लोक

नीडश्वसत्सुविश्वस्तसुप्तमात्रकपक्षिणम् । पाकच्युतफलोपान्तभूतकञ्चुकमण्डली ॥ २६ ॥ संदिग्धमूकभ्रमरं गुच्छैः पूजाक्षसूत्रकैः । श्यामलीकृतपर्यन्तं नीडैः पल्लवमण्डितैः ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

घोंसलों में साँस ले रहे पक्षी मुनि के प्रभाव से नि:शंक होकर सोने के कारण नहीं दिखाई देते थे। पहले भँवरों से परिवेष्टित, दैववश पकने के कारण नीचे गिरे हुए फलों में समीप में बैठे हुए मृगादि प्राणियों की अँगरखे की भाँति चारों ओर से परिवेष्टित मण्डलियों से भक्षण और मर्दन आदि की आशंका से भँवर आदि वहाँ पर संदेहयुक्त और भय से मूक थे । तात्कालिक जप में रुद्रेक्षमाला की तरह लटक रहे लता गुच्छं से उसने सारे वन को सुगन्धित कर दिया था। फूलों से आकाश को मानों मेघाच्छन्न कर दिया था