Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
बहुनात्र किमुक्तेन न किंचिदपि विद्यते ।
पत्रं यत्र तरौ यत्र नोष्यते वा न युज्यते ॥ २९ ॥
पत्रे पत्रे मृगाः सुप्ता विश्रान्ताश्च पदे पदे ।
कच्छे कच्छे खगा लीनास्तस्य भूरुहभूपतेः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
बहुत क्या कहूँ, उस वृक्ष में ऐसा एक भी पत्ता न था, जिस पर कोई जीव न रहता हो ओर किसी के
उपयोग में न आता हो । उस वृक्षराज के नीचे गिरे हुए प्रत्येक पत्ते पर मृग सोए थे, प्रत्येक स्थान पर
मृग आराम कर रहे थे और पेड़ में स्थित प्रत्येक पल्लव पर पक्षी बैठे थे