Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 21–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

अवश्यायोपशमितरतिखेदैर्मदालसैः । पुष्पधूलिसमालब्धैराश्लिष्टैर्निबिडं मिथः ॥ २१ ॥ पुष्पान्तरान्तःपुरगैः किमपि प्रणयोचितम् । ध्वनद्भिरभितः स्वच्छमत्तालियुगलैर्वृतम् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

हिमकणों से जिनका रतिश्रम शान्त हो गया था, मद से अलसाए हुए, पुष्पों की धूलि से सने हरे, परस्पर खूब आलिंगित, पुष्पगर्भरूपी अन्तःपुर में बैठे हुए, प्रेमोचित कुछ शब्द कर रहे मत्त भँवरों के अनेक जोड़ों से वह आवृत था