Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 7–9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, verses 7–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 7-9
संस्कृत श्लोक
दृष्टवांस्तमहं वृक्षं कोरकोत्तरकोटरम् ।
दाशूरस्येच्छया सर्वैरयतद्भिर्मृगव्रजैः ॥ ७ ॥
सेव्यमानं वनमिव लतामण्डलमण्डितम् ।
स्मितेन विस्फुटमिव श्वसनस्फुरितच्छदम् ॥ ८ ॥
लताकोटिगतैर्भ्रान्तैश्चामरैरिन्दुसुन्दरैः ।
शुभ्राभ्रखण्डनिकरैः शरन्नभ इवावृतम् ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
मैंने उस कदम्ब वृक्ष को देखा, जिसके खोखले कलियां से व्याप्त थे, और जो दाशूर की इच्छा से
किसी को व्याकुल न कर रहे मृगो के समूहों से लताओं के मण्डल से मण्डित वन की नाई सेवित था ।
वायु से उसके पल्लवरूपी होंठ हिल रहे थे, अतएव वह हैसने-से खिला हुआ-सा था । शाखाओं की
चोटियों पर बैठे हुए, चन्द्रमा के समान सुन्दर, भटके हुए चमरमृगों से, सफेद-सफेद मेघ खण्डो से
शरत्काल के आकाश के समान वह आवृत था