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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 16–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, verses 16–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 16-20

संस्कृत श्लोक

प्रवालारुणहस्तेन कुसुमस्मितशोभिना । मधुना घूर्णमानेन प्रान्तेन पुलकत्विषा ॥ १६ ॥ नीरन्ध्रपुष्पपूर्णेन घूर्णितेन वनानिलैः । निद्रालुकुड्मलदृशा स्तबकस्तनधारिणा ॥ १७ ॥ पुष्पजालरजःपुञ्जकुङ्कुमारुणवाससा । लताविताननिलयवातायननिषङ्गिणा ॥ १८ ॥ नीलपुष्पलतादोलालीलालास्यविलासिना । आपादमस्तकप्रान्तं सर्वतो निर्मितालयम् ॥ १९ ॥ वृन्देन वनदेवीनां कोकिलालापशालिना । संदिग्धमञ्जरीजालमलिनेत्रेण भासिना ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

अब “अलिनेत्रेण भासिना" यहाँ तक के श्लिष्ट विशेषणो से विलासी पुरुषरूप से कदम्ब या वसन्त अथवा वनदेवियो का वर्णन करते हुए उनके निवासरूप से कदम्ब का वर्णन करते हैं। पल्लवरूपी लाल हाथवाले, पुष्परूपी हास से सुशोभित मकरन्दरूपी मद से घूर्णमान, केसर से पूर्ण अतएव पुलको की शोभा धारण करनेवाले, पुष्पो से अत्यन्त निबिड ओर वनवायु से चंचल, कुण्डलरूपी निद्रालू नेत्रवाले, स्तबकरूपी स्तनों का पल्लवरूपी करों से स्पर्श करनेवाले, पुष्पों की धूलि राशिरूपी कुकुम से रक्तवरत्रवाले, लताओं से रचित वितानरूपी घरों के झरोखों पर अनुराग रखनेवाले, चिकने रहे पत्तों से भरी हुईं पुष्पयुक्त लताओं के झूलों में कौतुकपूर्वक झूलने में विलासी पुरुषरूप उसने पैर से लेकर मस्तक तक सब अवयव फूल, फल, पक्षी आदि आभूषणों के आश्रय बना डाले थे। वनदेवी के पक्ष में पललवों की तरह लाल हाथवाले, फूल की तरह निर्मल हास से शोभित होनेवाले, मद के नशे से घूर्णमान, केसर युक्त पुलक की कान्तिवाले, फूलों से खूब भरे हुए, वन की वायु से उल्लासयुक्त, कमल की तरह मुकुलित नेत्रवाले, स्तबकों की तरह स्तन धारण करनेवाले, पुष्पों की परागराशिरूप कुंकुम से अरुणवस्त्रवाले, लताओं से निर्मित वितानरूपी घरों के झरोखों पर बैठने में अनुरक्त, पत्तों से हरी-भरी फूली हुई लताओं के झूलो में झूलने के लिए विलासयुक्त, कोकिल की-सी मधुर ध्वनि से शोभित होनेवाले वनदेवियों के समूह ने उसके पैर से लेकर चोटी तक चारों और अपने-अपने निवास बना रक्खे थे। वसन्त के पक्ष में कदम्बपक्षोक्त विशेषणवाले वसन्त ने सदा उसके सवांग में अपना आलय बना रक्खा था । चमक रहे भँवरों के क्रम से लता और कदम्ब की मंजरियों में बैठने से क्या ये लता के नेत्र हैं अथवा कदम्ब के नेत्र हँ, यों सन्देहास्पद मंजरियों के जाल से वह युक्त था अथवा वनदेवियों के भँवरों के सदुश नेत्र वृन्दं से क्या ये वनदेवियों के नेत्र हैं अथवा भ्रमरयुक्त मंजरियाँ है, यों सन्देह में डालनेवाली मंजरियों से वह युक्त था