Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 24–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 24,25
संस्कृत श्लोक
क्षणं दलाग्रविश्रान्तमुग्धमुग्धशिरस्तया ।
पश्यद्भिरिन्द्वंशुकवज्जालामर्णवमेखलाम् ॥ २४ ॥
वनस्थलीनां तनयैर्नयैमूर्तिमिवास्थितैः ।
शुभैः पत्रपुटेष्वन्तर्मृगैः सारतलान्तरम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
पल्लवों में, जो तकिये के तुल्य थे, निद्रावश अथवा चपलता से क्षण भर रक्खे हुए दर्शनीय
सिरवाले अतएव चन्द्रमा की किरणों से आच्छादित, वनादिरुप अवयव समूहवाली भूमि को रात्रि के
बीतने की प्रतीक्षा से देख रहे, वन स्थलियों के पुत्र रूप एवं पत्तों के जालों के अन्दर छिपे हुए और
मुनि के प्रभाव से मूर्तिमान विनय की तरह स्थित बन्दरों से उसके अधोभाग और शाखादि अवयव
शोभायमान थे