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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, Verses 3–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 55, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 55 · श्लोक 3,4

संस्कृत श्लोक

अपश्यं तत्र दाशूरं शूरमिन्द्रियनिग्रहे । परेण तपसा युक्तं तेजसेव हुताशनम् ॥ ३ ॥ तेजोभिर्देहनिष्क्रान्तैः काञ्चनीकृतभूतलम् । तापयन्तं प्रदेशं तं भुवनं भास्करो यथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

वहाँ पर मैंने जैसे तेज से अग्नि युक्त रहती हे वैसे ही बड़ी भारी तपस्या से युक्त ओर इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने में शूरवीर दाशूर मुनि को देखा | देह से निकल रहे तेज से उन्होने सारी पृथ्वी को सुवर्णमय बना रक्खा था, उस प्रदेश को वे ऐसे सन्तप्त कर रहे थे जैसे कि सूर्य भुवनो को प्रकाशित करता है