Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 88
सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त अड्जासीवाँ सर्ग ब्रह्मा की अनासक्ति से सृष्टि -सिद्धि का वर्णन तथा मन से दृढ़ बद्धमूल हुए कार्य की अन्य उपायों से अनिवृत्ति का वर्णन ।
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- Verse 1श्री ब्रह्माजी ने कहा : हे ब्रह्मज्ञानियो में श्रेष्ठ वसिष्ठजी, “हे ब्रह्मवित्तम ब्रह्माज…
- Verse 2तदनन्तर उसके कथन को बहुत देर तक अपने मन से विचारकर मैंने कहा : हे भानो, मैं और क्या सृष्ट…
- Verse 3हे सूर्य, जहाँ पर ये दस ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं, वहाँ पर मेरी सृष्टि से और क्या प्रयोजन स…
- Verse 4हे महामुने, मेरे ऐसा कहने पर भानु ने अपनी बुद्धि से चिरकाल तक विचार कर इस विषय में यह युक…
- Verse 5सूर्य ने कहा : हे प्रभो, आपको किरी प्रकार की इच्छा नहीं है, किसी प्रकार की चेष्टा करने की…
- Verse 6हे प्रभो, निष्काम आपसे किसी प्रकार के मानसिक व्यापार के बिना ऐसे सृष्टि होती है, जैसे कि…
- Verse 7भगवन्, शरीर वपू अवयवसन्निवेश के त्याग में और उसमें अहम् अभिमान से राग करनेमें भी आपका भ…
- Verse 8हे प्राणियों के पालक, फिर भी जैसे सूर्य दिन का संहार करके फिर दिन की सृष्टि करते हैं वैसे…
- Verse 9आसक्तिरहित यह जगत्-सृष्टि करना मेरा कर्तव्य ही है, यह सोचकर केवल मनोविनोद के लिए जगत्सृ…
- Verse 10हे महेश, अपना नित्यकर्म सृष्टि अगर आप नहीं करेंगे, तो नित्यकमोकि परित्याग से अतिरिक्त और…
- Verse 11इसलिए सत्पुरुष को आसक्ति किये बिना जो कर्तव्य प्राप्त हुआ हो, उसे करना चाहिए, जैसे कि कलं…
- Verses 12–13जैसे आत्मज्ञानियों की अप्राप्त कर्म करने में कामना नहीं होती है वैसे ही प्राप्त कर्म के त…
- Verse 14हे जगत्प्रभो, इन ऐन्दवों की सृष्टि से अपने पुत्र, पौत्र आदि सम्पत्ति की वृद्धि देखने से य…
- Verse 15उनकी सृष्टि से मुझे सन्तोष हो, तथापि मेरी सृष्टि उनसे गतार्थ क्यो नहीं है ? इस पर कहते है…
- Verse 16तब तो ऐन्दव द्विजों की सृष्टि को ही मैं अपनी आँखों से देखू इस पर कहते हैं। हे परमेश्वर, ज…
- Verses 17–18यदि ऐसा है, तो मेरे मन से दिखाई देनेवाली यह ऐन्दव सृष्टि वृथा है और मेरे प्रतिकूल है; इसल…
- Verse 19जो कर्म इन्द्रियों द्वारा किया जाता है, उसका विनाश हो सकता है, पर मन के निश्चय से किए हुए…
- Verse 20नहीं हो सकता, देहका भले ही विनाश हो जाय, पर वह ज्योका त्यों बना रहता हे
- Verse 21जो वस्तु बद्धमूल है और मनमें चारों ओर से आरूढ है, तद्रूप ही पुरुष होता है, उसका दूसरा रूप…