Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 88, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 88, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
भानुरुवाच ।
निरीहस्य निरिच्छस्य कोऽर्थः सर्गेण ते प्रभो ।
विनोदमात्रमेवेदं सृष्टिस्तव जगत्पते ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
सूर्य ने कहा : हे प्रभो, आपको किरी प्रकार की इच्छा नहीं है, किसी प्रकार की चेष्टा करने
की आवश्यकता नहीं है, आपको सृष्टि से क्या प्रयोजन है ? हे जगत्पते, फिर भी जो सृष्टि
आप करते हैं, वह आपका केवल मनोविनोद मात्र हे