Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 88, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 88, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 88 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
यद्बद्धपीठमभितो मनसि प्ररूढं तद्रूपमेव पुरुषो भवतीह नान्यत् ।
तद्बोधनादितरमत्र किलाभ्युपायं शैलौघसेकमिव निष्फलमेव मन्ये ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जो
वस्तु बद्धमूल है और मनमें चारों ओर से आरूढ है, तद्रूप ही पुरुष होता है, उसका दूसरा रूप
नहीं हे । उसके बोध के सिवा अन्य उपाय शिला के टुकड़ों के समूहों को सींचने के तुल्य सर्वथा
निष्फल है, ऐसी मेरी धारणा है