Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verses 3–4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, verses 3–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 3 , 4
संस्कृत श्लोक
अपश्यदेव सूचित्वं सा तन्मानसमात्मनि ।
प्राणवातात्मिका प्राणैः प्रविश्य हृतमानसम् ॥ ३ ॥
अथात्मन्येव सूचित्वं पश्यत्येव मनोमयम् ।
प्राणवातशरीरासौ जगाम हिमवच्छिरः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसने पहले आत्मा में (अपने मे) मन से कल्पित जो सूचिता है, उसीको देखा ।
शंका : क्रियाशक्ति रहित आत्मा में (अपने मे) सूचिता का दर्शन होने पर भी उसमें
गमनक्रिया की सिद्धि कैसे हुई ?
समाधान - प्राणवायुरूप उस जीवयुक्त सूची ने अपने उपाधिभूत प्राणों से मन से कल्पित
लोहसूची में प्रवेश करके अपने में ही मनोमय लोहसूची की कल्पना की, तदनन्तर उसने अपने
मेँ ही मनोमय सूचिता को देखा ओर प्राणवायुरूप शरीर होकर वह हिमालय के शिखर में गई ।
तात्पर्य यह हुआ कि लोह सूची और जीवसूचीका अन्योन्य तादात्म्याध्यास होने से यह कर्कटी
प्राणवायुरूप शरीरवाली होकर क्रियाशक्ति को पाकर हिमालय के ऊपर गीध के शरीरम प्रवेश
करके गई, अतः आत्मा में क्रियाशक्ति न होने पर भी असंगति नहीं है