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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

सूच्या तया सुनिर्गत्य सुपाताक्ष्या स्म कूणितैः । पश्चात्सख्याभया साधुरन्योन्याचारकेवलम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

उन तीनों सूचियों के परस्पर शिर और मूल के यूँथने से परस्पर सम्बंध होने के कारण मानों उन्होने परस्पर की अनुकूलता का आचरण किया, ऐसी उत्प्रेक्षा करते हैं। पृष्ठरक्षक सूर्यकिरणरूप सखी का लोहसूची के साथ तथा द्वारभूत लोहसूची से भलीभाँति निकली हुई छायासूची के साथ, जिसका कि सूर्यकिरणों का गिरना ही नेत्र है, ग्रथन करने पर उन्होंने परस्पर द्वारा करने योग्य स्थिरता की सहायता में दढता की, इसलिए उनका वैसा करना उत्तम हुआ