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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 1, 2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । सूची सा संभवद्वाणी चिन्तयित्वेत्यकम्पनम् । पुनस्तद्देहलाभाय भवाम्याशु तपस्विनी ॥ १ ॥ इति संचिन्त्य चित्तस्थं संहृत्य जनमारणम् । तदेव हिमवच्छृङ्गं जगाम तपसे स्थितम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, इस प्रकार शोकमग्न हुई उस सूची ने मौन होकर, अत्यन्त निश्चलतापूर्वक (एकाग्रता से) पूर्वोक्त रीति से अपने देहादिका ओर आगे कहे जानेवाले प्रकार का चिन्तन कर फिर उरी देह के लाभ के लिए मैं शीघ्र तपस्विनी होऊ, ऐसा निश्चय किया । तदनन्तर पहले चित्तमें स्थित लोगों की हत्या का त्यागकर उसी हिमालय के शिखर में, जिसमें पहले वह रहती थी, तपश्चर्या के लिए गई

सर्ग सन्दर्भ

इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त बहत्तरवाँ सर्ग सूची के भीषण तप का वर्णन और उससे आश्चर्य मग्न इन्द्र का नारदोक्ति से निश्चय-कथन |