Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verse 12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
क्षुद्रेऽपि स्वजने भूतेऽप्येति वत्सलतां जनः ।
दीधित्यापि सखीवृत्तं सूच्यां शुचितया भृतम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
अत्यंत क्षुद्र भी अपने आत्मीय जीव में लोगों को प्रेम
होता है, किरण ने भी शुद्ध होने के कारण सूची में सखीभाव को धारण किया