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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verses 5–8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, verses 5–8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 5-8

संस्कृत श्लोक

दृढदावानले तत्र सर्वभूतविवर्जिते । महामहाशिलाभाभारूक्षे पांसुविधूसरे ॥ ५ ॥ तस्थावभ्युदितेवासौ निस्तृणे विपुले स्थले । मरावकस्मात्संजातशुष्का तृणशिखा यथा ॥ ६ ॥ सुसूक्ष्मस्यैकपादस्य सार्धेनैवाश्रितोर्वरा । स्वसंविदेकपादात्म तपः कर्तुं प्रचक्रमे ॥ ७ ॥ सूक्ष्मपादतलेनैषा वसुधारेणुसंकटी । निवार्य त्रिपदीं कृत्स्नाद्यत्नेनोर्ध्वमुखी स्थिता ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण प्राणियों से रहित, वनाग्नि की लपटों से पूर्ण, सूर्य के ताप से रूक्ष, धूलि से धूसरित, तृण रहित ओर विपुल उस विशाल-स्थान में बड़ी-बड़ी इन्द्रनीलमणि की शिलाओं के समान कान्तिवाली वह मानों अभ्युदित होकर स्थित हुई । वह मरुभूमि मेँ अकस्मात्‌ उत्पन्न होकर सूखी हुई तृणशिखा के समान प्रतीत होती थी । अत्यन्त सूक्ष्म एक पैर के एक सूक्ष्म हिस्से से उर्वर पृथ्वी में खड़ी हुई उसने अपनी कल्पना से एक पैररूप तप करना आरम्भ किया । भाव यह कि यद्यपि दो पैरवाले लोगों के समान एक पैर का परित्याग कर एकपादतारूप तप करना उसके लिए संभव नहीं था, क्योकि सूची को दो पैर हैं नहीं, तथापि अपनी कल्पना से ही कल्पित दो भार्गो में से आगे के अर्धं भाग का परित्याग करने से एकपादतारूप -एक पैर से स्थितिरूप-तप करना उसने आरम्भ किया। अत्यन्त सूक्ष्म पैर के तलुवे से (अत्यन्त तीखे अग्रभाग से) पृथ्वी की धूलि को भी पीडित करनेवाली वह सूची सामने ओर दोनों अगल-बगलरूप तीन भागों में फैली हुई दृष्टि को सम्पूर्णं विषयों से प्रयत्नपूर्वक हटाकर उपरको मुख करके स्थित हुई