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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, Verses 24–26

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 72, verses 24–26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 24-26

संस्कृत श्लोक

निवृत्ताया बहिःस्पन्दाद्देशकाले बहौ गते । विचारयन्त्यास्तस्याः स्वमात्मा सत्यं सुचेतनम् ॥ २४ ॥ ज्ञानालोकः समुदभूत्सा परावरदर्शिनी । बभूव निर्मला सूचिर्विषूची पावनं परम् ॥ २५ ॥ जाता विदितवेद्या सा स्वयमेव तया धिया । तपसा दुष्कृते क्षीणे सूची स्वसुखसूचिनी ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार तप कर रही उसके पापों का क्षय होने से और चिरकाल तक चित्त की एकाग्रता से उसको विचार-पूर्वक ज्ञान उत्पन्न हुआ, ऐसा कहते हैं। बाह्य व्यापारों से निवृत्त हुई सत्य, सुचेतन अपने स्वरूप का विचार कर रही उसके बहुत देश-काल के बीतने पर उसकी आत्मा ही ज्ञानप्रकाशरूप अर्थात्‌ आत्मसाक्षात्कारवृत्ति से प्रदीप्त बोधरूप हो गई । पर और अवर को देखनेवाली (परब्रह्मसाक्षात्कारवती) वह सोपसर्गा सूची निर्मल हो गई और परम पावन हो गई । तपस्या से पापों के क्षीण होने पर अपने सुख को सूचित करनेवाली उस सूचीने पैनी बुद्धि से स्वयं ही ज्ञातव्य तत्त्वका ज्ञान प्राप्त कर लिया