Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 3
दूसरा सर्ग समाप्त तीसरा सर्ग ब्रह्मा स्वयं मनोरूप है ओर उसका संकल्परूप यह जगत् है, इसलिए यह मनोराज्य के समान असत् ही है ।
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- Verses 1–2“मनोमात्रं च संकल्पः पृथ्व्यादिरहिताकृति: ।* इस प्रकार पीछे (यो.वा. 3-२-४९) कही गईं रीति…
- Verses 3–4ठीक है, पूर्व देह आदि की सिद्धि होने पर उससे अनुभूत को विषय करनेवाली स्मृति ब्रह्मा के शर…
- Verses 5–6शंका: तद्धैतल्लोकजिदेव” (वह यह प्राणदर्शन कर्मराहित यानी केवल भी लोकका साधन ही होता है )…
- Verse 7श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, सम्पूर्ण भूतों के (प्राणियों के) एक आतिवाहिक और दूसरा आध…
- Verse 8श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, कारणयुक्त (पंचीकृत भूतों से उत्पन्न देह आदि से…
- Verses 9–10इसी बात को दूसरे प्रकार से कहते हैं। एक अज (हिरण्यगर्भ) सम्पूर्ण भूतों का परम कारण है । उ…
- Verses 11–12यों उसके संकल्प से कल्पित जगत् भी उसका अधिष्ठानथूत चैतन्यमात्र ही है, यह अर्थ सिद्ध हुआ,…
- Verses 13–21यों जगत् की ब्रह्ममात्रता सिद्ध हुई, यह भाव है। इससे जीवकी भी ब्रह्ममात्रता सिद्ध हुई, य…
- Verse 22यदि ऐसा है, तो सब पदार्थों में संकल्पमय पर्वत से विलक्षण आधिभाौतिकत्व, अर्थक्रियाकारित्व…
- Verses 23–24तब तो ब्रह्मा को भी, हम लोगों की नाई, आतिवाहिकभाव विस्मृत क्यो नहीं होता ? इस पर कहते हैं…
- Verse 25जब ब्रह्मा ही मनोमात्र है, पृथिवी आदिमय नहीं है, तब उससे उत्पन्न हुआ यह विश्व भी मनोमात्र…
- Verses 26–27इस प्रकार “अन्नेन सोम्य शुगेनापो मूलमन्विच्छ“ (हे सौम्य, अन्नरूप कार्य से कारण जल को खोजो…
- Verses 28–30इस प्रकार भेदक न होने के कारण कार्यकारणभाव के न होने से जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है, यह सिद्…
- Verse 31इस प्रकार जगत् के ही बाधित होने पर तत्त्वज्ञो को देह आदि में आधिभौतिकत्व की प्रतीति नहीं…
- Verses 32–38कैमुतिकन्याय से भी उक्त अर्थ को दढ करते हैं। ज्ञानी का आतिवाहिक (प्रातिभासिक) शरीर भी नही…
- Verse 39यदि सम्पूर्ण दृश्य हृदय में है, तो अभी सबको उसका अनुभव क्यो नहीं होता ? इस पर कहते हैं। ज…
- Verse 40यदि कोई कहे कि महान् प्रयास से दृश्यका मिथ्यात्व क्यो सिद्ध करते हो ? उसके सत्य होने पर…