Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 23 ,24
संस्कृत श्लोक
इदं प्रथमतोद्योगसंप्रबुद्धं महाचितेः ।
नोदेति शुद्धसंवित्त्वादातिवाहिकविस्मृतिः ॥ २३ ॥
आधिभौतिकजातेन नास्योदेति पिशाचिका ।
असत्या मृगतृष्णेव मिथ्या जाड्यभ्रमप्रदा ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो ब्रह्मा को भी, हम लोगों की नाई, आतिवाहिकभाव विस्मृत क्यो नहीं होता ? इस
पर कहते हैं।
यह ब्रह्मा का रूप मायाशबल ब्रह्म की प्रथमता (सम्पूर्ण स्थूल प्रपंच की अपेक्षा कारणभूत
सूक्ष्मभूतता) है, सत्यसंकल्प होने के कारण उनमें स्वसंकल्प से वैसे ही प्रत्यक्ष आविर्भूत
रहता है, अतः अन्धकार से आच्छादित न होने के कारण शुद्ध संवित्रूप प्रजापति को
आतिवाहिक भाव की विस्मृति नहीं होती । इसलिए ब्रह्मा को आधिभौतिक से उत्पन्न हुई
मृगतृष्णा के समान असत्य जड़तारूपी भ्रम देनेवाली पिशाचिका उत्पन्न नहीं होती