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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

आतिवाहिकमेवान्तर्विस्मृत्या दृढरूपया । आधिभौतिकबोधेन मुधा भाति पिशाचवत् ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसा है, तो सब पदार्थों में संकल्पमय पर्वत से विलक्षण आधिभाौतिकत्व, अर्थक्रियाकारित्व आदि का अनुभव कैसे होता है ? इस पर कहते हैं। अपने स्वरूप के दृढ विस्मरण और आतिवाहिक भाव के विस्मरण से आतिवाहिक ही सर्वथा असत्य पिशाच की नाई आधिभौतिकरूप से प्रतीत होता हे । जैसे कि पिशाच वास्तव में सर्वथा असत्‌ होता हुआ भी भ्रमवश आकारवान्‌-सा प्रतीत होता है, वैसे ही लोगों को स्वरूप की दृढ विस्मृति से आतिवाहिक ही आधिभौतिकरूप से प्रतीत होता हे