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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 32–38

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, verses 32–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 32-38

संस्कृत श्लोक

आतिवाहिक एवास्ति न प्रबुद्धमतेः किल । आधिभौतिकदेहस्य वाचो वात्र कुतः कथम् ॥ ३२ ॥ मनोनाम्नो मनुष्यस्य विरिञ्च्याकारधारिणः । मनोराज्यं जगदिति सत्यरूपमिव स्थितम् ॥ ३३ ॥ मन एव विरिञ्चित्वं तद्धि संकल्पनात्मकम् । स्ववपुः स्फारतां नीत्वा मनसेदं वितन्यते ॥ ३४ ॥ विरिञ्चो मनसो रूपं विरिञ्चस्य मनो वपुः । पृथ्व्यादि विद्यते नात्र तेन पृथ्व्यादि कल्पितम् ॥ ३५ ॥ पद्माक्षे पद्मिनीवान्तर्मनो दृद्यस्ति दृश्यता । मनोदृश्यदृशौ भिन्ने न कदाचन केनचित् ॥ ३६ ॥ यथा चात्र तव स्वप्नः संकल्पश्चित्तराज्यधीः । स्वानुभूत्यैव दृष्टान्तस्तस्माद्धृद्यस्ति दृश्यभूः ॥ ३७ ॥ तस्माच्चित्तविकल्पस्थपिशाचो बालकं यथा । विनिहन्त्येवमेषान्तर्द्रष्टारं दृश्यरूपिका ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

कैमुतिकन्याय से भी उक्त अर्थ को दढ करते हैं। ज्ञानी का आतिवाहिक (प्रातिभासिक) शरीर भी नहीं है, फिर उसकी आधिभौतिक देह का कथन केसे हो सकता है ? ब्रह्मा के आकार को धारण करनेवाले मन नामक मनुष्य का मनोराज्य यह जगत्‌ सत्यरूप-सा स्थित हे । मन ही ब्रह्मा है, वह संकल्पात्मक अपने शरीर को विपुल बनाकर मन से इस जगत्‌ की रचना करता हे । ब्रह्मा मनःस्वरूप है ओर मन ब्रह्मस्वरूप है, मनमें पृथिवी आदि नहीं है । मन से पृथिवी आदि आत्मा में अध्यस्त हैँ । कमलगट्टे के अन्दर कमलकी लता के समान हृदय के अन्दर सम्पूर्ण दृश्य पदार्थ विद्यमान हैँ । (यदि कोई कहे कि पहले श्लोक से मन मे पृथिवी आदि नहीं है, ऐसा कहा और इस श्लोक से मन में दृश्य पदार्थ हैं, ऐसा कहा, यो परस्पर विरुद्ध कैसे कहते है, तो इस पर कहते है । चूँकि मन और दृश्य तथा इन दोनों का द्रष्टा अर्थात्‌ साक्षीभूत आत्मा-इन दोनों का विवेक (पार्थक्य) किसीने कभी नहीं किया जबतक उनका विवेक न किया जाय, तब तक अज्ञान का उच्छेद न होने से मनमें दृश्यवर्ग है ही, इसलिए ऐसा कहा है । अथवा मन और दृश्यदर्शन-इन दोनों का अभी उच्छेद नहीं हुआ है, इसलिए वैसा कहा गया है। निष्कर्ष यह निकला कि मनका उच्छेद ही दृश्यदर्शन का उच्छेद है। जैसे आपके हृदय में मनोराज्यबुद्धि अपने अनुभव से ही देखी गई है और जैसे स्वप्न तथा संकल्प आपके हृदयमें अपने अनुभवसे ही देखे गये हैं, वैसे ही आपके हृदय में दृश्यभू (दृश्यवर्ग) है । इसलिए जैसे चित्त द्वारा कल्पित पिशाच बालक को मार देता है, वैसे ही दृश्यरूपिणी रूपिका (पिशाची) इस द्रष्टा को मार देती है यानी स्वरूप से भ्रष्ट कर देती है