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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

चित्तमात्रशरीरोऽसौ न पृथ्व्यादिक्रमात्मकः । आद्यः प्रजापतिर्व्योमवपुः प्रतनुते प्रजाः ॥ ११ ॥ ताश्च चिद्व्योमरूपिण्यो विनान्यैः कारणान्तरैः । यद्यतस्तत्तदेवति सर्वैरेवानुभूयते ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यों उसके संकल्प से कल्पित जगत्‌ भी उसका अधिष्ठानथूत चैतन्यमात्र ही है, यह अर्थ सिद्ध हुआ, यों कहने की इच्छा से कहते हैं। हे रामजी, पृथिवी आदि से शून्य, संकल्पमात्रशरीर चिदाकाशरूप आदि प्रजापति ने विविध प्रजाओं की सृष्टि की । वे प्रजा ब्रह्मा के संकल्प से अतिरिक्त कारणों से उत्पन्न नहीं हुई है, अतः वे भी चिदाकाशस्वरूप हैं । जिस उपादान कारण से जो उत्पन्न हुआ है वह तद्रूप ही होता है, यह बात कनककुण्डल आदि में सभीके द्वारा अनुभूत है