Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, Verses 28–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 3, verses 28–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 28-30
संस्कृत श्लोक
कार्यकारणता ह्यत्र न किंचिदुपपद्यते ।
यादृगेव परं ब्रह्म तादृगेव जगत्त्रयम् ॥ २८ ॥
मनस्तामिव यातेन ब्रह्मणा तन्यते जगत् ।
अनन्यादात्मनः शुद्धाद्द्रवत्वमिव वारिणः ॥ २९ ॥
मनसा तन्यते सर्वमसदेवेदमाततम् ।
यथा संकल्पनगरं यथा गन्धर्वपत्तनम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार भेदक न होने के कारण कार्यकारणभाव के न होने से जगत् ब्रह्मस्वरूप ही है,
यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहते हैं ।
इस विश्व में कार्यकारणता की तनिक भी उपपत्ति नहीं होती । जैसा परब्रह्म है, ठीक वैसे
ही तीनों जगत हैं । द्रवत्व से अभिन्न स्वरूपवाले जलसे जैसे द्रवत्व का विस्तार होता है, वैसे
ही मनोरूपता को प्राप्त हुए ब्रह्मा द्वारा जगत् से अभिन्न शुद्ध आत्मा से जगत् का विस्तार
किया जाता है । जैसे असत् संकल्पनगर की मन से ही कल्पना होती है और जैसे असत्
गन्धर्वनगर की मन से ही कल्पना होती है, वैसे ही यह असत्रूप समस्त विश्व केवल मन से ही
कल्पित है