Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 29
अट्वाईसवाँ सर्ग समाप्त उनतीसवाँ सर्ग लीला के पूर्व जन्मों के चरित्रों की प्रत्यभिज्ञा का वर्णन तथा लोकों की राशियों से मण्डित आकाशमें गमन वर्णन ।
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- Verses 1–3जैसे आत्मज्ञानी अतएव शान्त पुरुष में भोगश्री और मोक्षश्री प्राप्त होती हे, वैसे ही सुशीतल…
- Verses 4–14लहरों की अन्तिम सीमारूप तटों मे उगे हुए हरी हरी घास के तिनकोंसे बछियों की तृप्ति करती थी…
- Verses 15–19ब्राह्मणी जन्म में इस तरह चिरकाल से कार्य मे व्यावृत लीला की बुढ़ापे के आक्रमण से कान में…
- Verses 20–24हे देवि, यहाँ पर मैने भोजन किया । यहाँ पर निवास किया, यहाँ पर मैं बैठी, यहाँ सोई, यहाँ जल…
- Verses 25–34यह गृहमण्डप दिखाई देता है, जो कि शिलामय तट भूमि में फूलों के गुच्छों को सदा टक्कर देनेवाल…
- Verses 35–38जैसे आकाश में वायु अदृश्य होकर रहता है और जैसे वायु में सुगन्धि अदृश्य होकर रहती है वैसे…
- Verses 39–46श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, देवी से यह कहकर नतमस्तक हुई लीला झटपट गृह मण्डप मे…
- Verse 47लीला ने कहा : हे देवि, सूर्य आदि का तेज नीचे कहाँ चला गया, पत्थर के मध्यभागके समान निबिड…
- Verses 48–49श्रीदेवी ने कहा : भद्रे, तुम कितने दूर आकाशमार्ग मे आ गई हो, जहाँ से सूर्य आदि तेज दिखाई…
- Verses 50–52ने कहा : देवीजी, ओ हो ! क्या हम लोग इतने दूर मार्ग मेँ आ गये, जिससे सूर्य तक परमाणु के सम…
- Verse 53श्रीदेवीजी ने कहा : भद्रे, इसके बाद आगे ब्रह्माण्डसंपुट के ऊपरके कपाल में तुमको जाना है,…
- Verses 54–60वे वहाँ से, जैसे कोई आकाश से निकले वैसे ही अनायास निकली | जो वस्तु सत्यता के अध्यवसायमें…