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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 39–46

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verses 39–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 39-46

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा प्रणता देवीं सा प्रविश्याशु मण्डपम् । विहंगीव तया साकं पुप्लुवे सिनिभं नमः ॥ ३९ ॥ भिन्नाञ्जनचयप्रख्यं सौम्यैकार्णवसुन्दरम् । नारायणाङ्गसदृशं भृङ्गपृष्ठामलच्छवि ॥ ४० ॥ मेघमार्गमतिक्रम्य वातस्कन्धावनिं तथा । सौरमार्गमथाक्रम्य चन्द्रमार्गमतीत्य च ॥ ४१ ॥ धुवमार्गोत्तरं गत्वा साध्यानां मार्गमेत्य च । सिद्धानां समतीत्योर्वीमुल्लङ्घ्य स्वर्गमण्डलम् ॥ ४२ ॥ ब्रह्मलोकोत्तरं गत्वा तुषितानां च मण्डलम् । गोलोकं शिवलोकं च पितृलोकमतीत्य च ॥ ४३ ॥ विदेहानां सदेहानां लोकानुत्तीर्य दूरगम् । दूराद्दूरमथो गत्वा किंचिद्बुद्धा बभूव सा ॥ ४४ ॥ पश्चादालोकयामास समतीतं नभस्थलम् । यावन्न किंचिच्चन्द्रार्कताराद्यालक्ष्यते ह्यधः ॥ ४५ ॥ तमस्तिमितगम्भीरमाशाकुहरपूरकम् । एकार्णवोदरप्रख्यं शिलोदरघनं स्थितम् ॥ ४६ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, देवी से यह कहकर नतमस्तक हुई लीला झटपट गृह मण्डप में प्रवेश कर देवी के साथ चिड़िया की नाई तलवार के तुल्य नीले आकाश में उडी । पीसे हुए अंजन के ढेर के सदश श्याम, निश्चलसागर के समान मनोहर, भगवान्‌ श्रीविष्णु की अंगकान्ति के तुल्य श्यामल, भँवरे की पीठके सदृश निर्मल कान्तिवाले आकाशको लाँघकर, प्रवह आदि उनचास वायुओं के लोक को लाँघ कर, तदनन्तर सूर्यमार्ग और चन्द्रमार्ग का उल्लंघन कर, धुवलोक के ऊपर पहुँचकर, सिद्धों के लोक में जाकर, सिद्धों के लोक को र्लौँघकर,.स्वर्गमण्डल से ऊपर चढ़कर, ब्रह्मलोक में जाकर तुषितों (नित्यसन्तुष्टों) के लोक में (वैकुण्ठ में) पहुँचकर, तदनन्तर क्रमशः गोलोक, शिवलोक और पितृलोक का अतिक्रमण कर, विदेह और सदेह मुक्तोके अतिदूरवर्ती लोक को पार कर अत्यन्त दूर जाकर लीला कुछ प्रबुद्ध हुई । दूर जाकर जब नीचे चन्द्रमा, तारा आदि कुछ भी नहीं दिखाई देते थे, दिशारूपी गर्तो को भरनेवाला एकमात्र सागर के सदुश, पत्थरके मध्यभाग के समान ठोस, निश्चल और गम्भीर अन्धकार ही अन्धकार था, तब उसने पीछे अतीत आकाशस्थल को देखा