Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 15–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verses 15–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 15-19

संस्कृत श्लोक

जीर्णपर्णसवर्णैककर्णदोलाधिरूढया । काष्ठताड्यजराभीतजीववृत्त्येव चिह्निता ॥ १५ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा संचरन्ती सा शिखरिग्रामकोटरे । संचरन्त्याः सरस्वत्या दर्शयामास सस्मयम् ॥ १६ ॥ इयं मे पाटलाखण्डमण्डिता पुष्पवाटिका । इयं मे पुष्पितोद्यानमण्डपाशोकवाटिका ॥ १७ ॥ इयं पुष्कीरणीतीरद्रुमाऽऽग्रन्थिततर्णका । इयं सा कर्णिकानाम्नी तर्णिका मुक्तपर्णिका ॥ १८ ॥ इयं सा मेऽलसाकीर्णा वराकी जलहारिका । अद्याष्टमं दिनं बाष्पक्लिन्नाक्षी परिरोदिति ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणी जन्म में इस तरह चिरकाल से कार्य मे व्यावृत लीला की बुढ़ापे के आक्रमण से कान में बहिरापन, शिरःकम्पन, कूबड़ापन, लाठी लेकर चलने की नौबत आनेपर जो दशा हई उसका वह वर्णन करती है । मैं वहाँ पर पुराने पत्ते के समान वर्णवाले शरीर का जो एक कान, शिर के कम्पन से झूलने के कारण, वहीं ठहरा झूला, उसमें चढी हुई सी, टेकने की लड़ी के उठाने पर उससे ताडन करने के योग्य सी, बुढ़ापे से भयभीत-सी, अन्तिम जीवन वृत्ति से चिह्नित सी हुई । श्रीवसिष्ठजी ने कहा : यह कहकर पर्वत ग्राम के मध्य में भ्रमण कर रही लीला ने घूम रही सरस्वती देवी को विस्मयपूर्वक दिखलाया हे देवि, पाटल वृक्षों से अत्यन्त सुशोभित यह मेरी पुष्पवाटिका हे । यह मेरी उद्यान मण्डप की अशोकवाटिका खिली हुई हे । यह पोखरा है, जिसके तट के पेड़ों में बछड़े धे हैँ । यह कर्णिका नाम की मेरी बिया है, इसने मेरे वियोग दुःख से घास छोड़ दी हे । यह बेचारी मेरी पनिहारि है, मेरे वियोग-दु-ख से इसे अपना काम करने की फुर्ती नहीं है, यह धूलि से पूर्ण है । आज पूरे आठ दिन हो गये हैँ इसकी आँखका पानी नहीं सूखा, बेचारी लगातार रोती हे