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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । तत्र ते पेततुर्देव्यौ ग्रामेऽन्तःशीतलात्मनि । भोगमोक्षश्रियौ शान्ते पुंसीव विदितात्मनि ॥ १ ॥ कालेनैतावता लीला तेनाभ्यासेन साभवत् । शुद्धज्ञानैकदेहत्वात्त्रिकालामलदर्शिनी ॥ २ ॥ अथ सस्मार सर्वास्ताः प्राक्तनीः संसृतेर्गतीः । सा स्वयं स्वरसेनैव प्राग्जन्ममरणादिकाः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे आत्मज्ञानी अतएव शान्त पुरुष में भोगश्री और मोक्षश्री प्राप्त होती हे, वैसे ही सुशीतल सुरम्य उस गिरिग्राम में वे दोनों देविर्यो पहुँची । इतने समय में उक्त अभ्यास से लीला केवल शुद्ध ज्ञानरूप देहवाली होने के कारण भूत, भविष्यत्‌ ओर वर्तमानरूप तीनोंकालों को भलीभाँति देखनेवाली हो गई थी । तदनन्तर उसे संसार की प्राक्तन जन्ममरणरूप सम्पूर्ण गतियो का अनायास ही स्मरण होने लगा

सर्ग सन्दर्भ

अट्वाईसवाँ सर्ग समाप्त उनतीसवाँ सर्ग लीला के पूर्व जन्मों के चरित्रों की प्रत्यभिज्ञा का वर्णन तथा लोकों की राशियों से मण्डित आकाशमें गमन वर्णन ।