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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 20–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verses 20–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 20-24

संस्कृत श्लोक

इह देवि मया भुक्तमिहोषितमिह स्थितम् । इह सुप्तमिहापीतमिह दत्तमिहाहृतम् ॥ २० ॥ एष मे ज्येष्ठशर्माख्यः पुत्रो रोदिति मन्दिरे । एषा मे जङ्गले धेनुर्दोग्ध्री चरति शाद्वलम् ॥ २१ ॥ गृहे वसन्तदाहाय रूक्षक्षारविधूसरम् । स्वदेहमिव पञ्चाक्षं पश्येमं प्रघणं मम ॥ २२ ॥ तुम्बीलताभिरुग्राभिः पुष्टाभिरिव वेष्टितम् । महानसस्थानमिदं मम देहमिवापरम् ॥ २३ ॥ एते रोदनताम्राक्षा बन्धवो भुवि बन्धनम् । अङ्गदार्पितरुद्राक्षा आहरन्त्यनलेन्धनम् ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे देवि, यहाँ पर मैने भोजन किया । यहाँ पर निवास किया, यहाँ पर मैं बैठी, यहाँ सोई, यहाँ जल पिया, यहाँ दिया और यहाँ फल, अन्न आदि लाई यह मेरा ज्येष्ठशर्मा नाम का पुत्र घर में रो रहा हे । यह मेरी दुधार गाय जंगल में हरी घास चर रही है। वसन्त के आरम्भ में होली जलाने के लिए बनाया गया, भस्मसे धूसर, पाँच खिड़कियोंवाला यह बरामदा पाँच ज्ञानेन्द्रियोंसे युक्त मेरी देह के समान मेरा प्रिय है, इसे देखो । मानों स्वयं चढ़कर पली हुई तितलो की की लताओं से छत में वेष्टित बड़ी बड़ी नसोंसे वेष्टित मेरे शरीर के सदुश यह रसोई घर है संसार में मेरे बन्धनरूप से बन्धुबान्धव, अग्नि और काष्ठ ला रहे हैं, सदा रोने के कारण इन बेचारों की आँखें लाल हो गई हैं और बाजूबन्दों में ये रुद्राक्ष धारण किये है