Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verse 53
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति प्रकथयन्त्यौ ते प्राप्ते ब्रह्माण्डकर्परम् ।
भ्रमर्याविव शैलस्य कुड्यं निबिडमण्डपम् ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीदेवीजी ने
कहा : भद्रे, इसके बाद आगे ब्रह्माण्डसंपुट के ऊपरके कपाल में तुमको जाना है, चन्द्रमा
आदि जिस ब्रह्माण्डसंपुट के ऊपर के कपाल के धूलिकण से उत्पन्न हुए हैं।।५ २॥ श्रीवसिष्ठजी
ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, जैसे दो भ्रमरियाँ पर्वत के छिद्ररहित (ठोस) भाग को प्राप्त होती हैं,
वैसे ही इस प्रकार आपस में प्रश्नोत्तर कर रहीं वे दोनों ललनाएँ ब्रह्माण्डसंपुट के ऊपरवाले
खप्पर पर पहुँची