Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 50–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verses 50–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 50,51
संस्कृत श्लोक
लीलोवाच ।
अहो नु पदवीं दूरमावामेतामुपागते ।
सूर्योऽप्यधोणुकणवन्न मनागपि लक्ष्यते ॥ ५० ॥
इत उत्तरमन्या स्यात्पदवी का नु कीदृशी ।
कथं च मातरेतव्या कथ्यतामिति देवि मे ॥ ५१ ॥
श्रीदेव्युवाच ।
इत उत्तरमग्रे ते ब्रह्माण्डपुटकर्परम् ।
यस्य चन्द्रादयो नाम धूलिलेशाः समुत्थिताः ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
ने कहा : देवीजी, ओ हो ! क्या हम लोग इतने दूर मार्ग मेँ आ गये, जिससे सूर्य तक परमाणु के
समान नीचे तनिक भी दिखाई नहीं देता है | माँ, इससे आगे दूसरा मार्ग कौन और कैसा होगा
और उसमें कैसे जाना होगा ? हे देवि, यह सब आप मुझसे कहिये