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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 25–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verses 25–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 25-34

संस्कृत श्लोक

अनारतं शिलाकच्छे गुच्छाच्छोटनकारिभिः । तरङ्गैः स्थगिताकारं स्पृष्टतीरलतादलैः ॥ २५ ॥ सीकराकीर्णपर्यन्तशाद्वलस्थलसल्लतैः । शिलाफलहकास्फालफेनिलोत्पलसीकरैः ॥ २६ ॥ तुषारीकृतमध्याह्नदिवाकरकरोत्करैः । फुल्लपुष्पोत्करासारप्रणादोत्कतटद्रुमैः ॥ २७ ॥ विद्रुमैरिव संक्रान्तफुल्लकिंशुककान्तिभिः । व्याप्तया पुष्पराशीनां समुल्लासनकारिभिः ॥ २८ ॥ उह्यमानफलापूरसुव्यग्रग्रामबालया । महाकलकलावर्तमत्तया ग्रामकुल्यया ॥ २९ ॥ वेष्टितस्तरलास्फालजलधौततलोपलः । घनपत्रतरुच्छन्नच्छायासततशीतलः ॥ ३० ॥ अयमालक्ष्यते फुल्ललतावलनसुन्दरः । दलद्गुलुच्छकाच्छन्नगवाक्षो गृहमण्डपः ॥ ३१ ॥ अत्र मे संस्थितो भर्ता जीवाकाशतयाऽकृतिः । चतुःसमुद्रपर्यन्तमेखलाया भुवः पतिः ॥ ३२ ॥ आ स्मृतं पूर्वमेतेन किलासीदभिवाञ्छितम् । शीघ्रं स्यामेव राजेति तीव्रसंवेगधर्मिणा ॥ ३३ ॥ दिनैरष्टभिरेवासौ तेन राज्यं समृद्धिमत् । चिरकालप्रत्ययदं प्राप्तवान्परमेश्वरि ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

यह गृहमण्डप दिखाई देता है, जो कि शिलामय तट भूमि में फूलों के गुच्छों को सदा टक्कर देनेवाली, तटवर्ती लताओं के पत्तों को छूनेवाली, आस पास के हरे मैदानों तथा सुन्दर लताओं को सीकरों से व्याप्त करनेवाली एवं शिला पर टक्कर लगने से फेनयुक्त ओर नीलकमल की गन्ध से सुवासित जलकणों से पूर्ण लहरों से ठका हुआ है, मध्याह्न के सूर्य की किरणराशियों को भी बर्फ के सदुश शीतल करनेवाले, फूले हुए है, मध्याह के सूर्य की किरणराशियों को भी बर्फ के सदुश शीतल करनेवाले, फूले हुए फूलों की राशि पर मँडराने वाले भ्रमरों के गुँजार से उत्कण्ठित ऐसे बीच बीच में संनिविष्ठ फूले हुए पलाश वृक्षों की छवि से युक्त अतएव मूगं के वृक्षों के तुल्य प्रतीत होनेवाले एवं पुष्पराशि का विकास करनेवाले तटवर्ती वृक्षों से व्याप्त ग्रामीण नहर से, जिसके प्रवाह में बह रहे आम आदि फलों को लेने में ग्रामीण लड़कियाँ अतिव्यग्र है, जो प्रचुर कलकल शब्द करनेवाली जलभौरियों से मदमत्तसी प्रतीत होती है, घिरा हुआ है, बड़ी तेजी से बहनेवाले जल से जिसके पत्थर घुले हुए है, सघन पत्तेवाले वृक्षों की निबिड छाया से जो सदा शीतल है, फूली हुई लताओं के परिवेष्टन से बड़ा भला प्रतीत होता हे ओर खिल रही गुलुच्छलता से जिसकी खिड़कियाँ आच्छन्न हैँ । इसमें मेरे पतिदेव जीवाकाश होने के कारण निष्क्रिय होते हुए भी चार सागरपर्यन्त पृथिवी के स्वामी बन कर रहते थे । हाँ, मुञ्चे स्मरण हुआ कि दृढ़ संकल्पवाले इन्होंने पहले मैं शीघ्र राजा होऊ, ऐसी अभिलाषा की थी, इसलिए हे देवी, आठ ही दिनों में इन्होंने समृद्धिशाली राज्य प्राप्त किया, जो कि चिरकाल की प्रतीति देनेवाला था