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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, Verses 4–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 29, verses 4–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 4-14

संस्कृत श्लोक

लीलोवाच । देवि देशमिमं दृष्ट्वा त्वत्प्रसादात्स्मराम्यहम् । इह तत्प्राक्तनं सर्वं चेष्टितं चेष्टितान्तरम् ॥ ४ ॥ इहाभूवमहं जीर्णा शिरालाङ्गी कृशा सिता । ब्राह्मणी शुष्कदर्भाग्रभेदरूक्षकरोदरा ॥ ५ ॥ भर्तुः कुलकरी भार्या दोहमन्थानशालिनी । माता सकलपुत्राणामतिथीनां प्रियंकरी ॥ ६ ॥ देवद्विजसतां भक्ता सिक्ताङ्गी घृतगोरसैः । भर्जनी चरुकुम्भादिभाण्डोपस्करशोधिनी ॥ ७ ॥ नित्यमन्नलवाक्तैककाचकम्बुप्रकोष्ठका । जामातृदुहितृभ्रातृपितृमातृप्रपूजनी ॥ ८ ॥ आदेहं सद्मभृत्यैव प्रक्षीणदिनयामिनी । वाचं चिरं चिरमिति वादिन्यनिशमाकुला ॥ ९ ॥ काहं क इव संसार इति स्वप्नेऽप्यसंकथा । जाया श्रोत्रियमूढस्य तादृशस्यैव दुर्धियः ॥ १० ॥ एकनिष्ठा समिच्छाकगोमयेन्धनसंचये । म्लानकम्बलसंवीतशिरालकृशगात्रिका ॥ ११ ॥ तर्णकीकर्णजाहस्थकृमिनिष्कासतत्परा । गृहशाकायनासेकसत्वराहूतकर्परा ॥ १२ ॥ नीलनीरतरङ्गान्ततृणतर्पिततर्णिका । प्रतिक्षणं गृहद्वारकृतलेपनवर्णका ॥ १३ ॥ नीत्यर्थं गृहभृत्यानामादीनकृतवाच्यता । मर्यादानियमादब्धेर्वेलेवानिशमच्युता ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

लहरों की अन्तिम सीमारूप तटों मे उगे हुए हरी हरी घास के तिनकोंसे बछियों की तृप्ति करती थी । प्रतिक्षण घर के दरवाजे पर लेपन और एेपन दिया करती थी । घर के नौकर- चाकरों को विनय, सदाचार आदि सिखलाने के लिए कुछ दीनता के साथ (ऐसे लोगों के घर में इस तरह के अविनीत नौकर-चाकर कैसे रहते हैं" ऐसा लोग कहेंगे, यो जन -निन्दा का दिग्दर्शन कराया करती थी। मर्यादा के नियमरूप समुद्र की वेलासदृश मैं स्वयं कभी भी अपने कर्तव्य से भ्रष्ट नहीं होती थी, यों अपने चरित्र से भी उन्हें शिक्षा दिया करती थी