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Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 22

इक्कीं सर्वौ सर्ग समाप्त बाईसवाँ सर्ग तुरीय अवस्था, जीवन्मुक्त की स्थिति, वासनाओं के क्षयका उपाय ओर उसके अभ्यास का प्रतिपादन |

19 verse-groups

  1. Verse 1परिपक्व ज्ञान होने से पूर्व कही गईं स्थूल देहता की निवृत्ति ओर आतिवाहिकता की प्राप्ति को…
  2. Verse 2जैसे स्वप्न के ज्ञानसे स्वप्न देह लापता हो जाती है, वैसे ही वासनाओं के क्षीण होने से जाग्…
  3. Verses 3–4जैसे स्वप्न में प्रतीयमान स्वप्नदेह का ओर मनोरथ द्वारा कल्पित कल्पनामय देह का विनाश होने…
  4. Verse 5यदि को शंका करे कि जीवन्मुक्तो में भी वासना है ही, क्योकि यदि उनमें वासना न होती, तो उनका…
  5. Verse 6मूर्छा ओर सुषुप्ति में अवान्तर भेद दशतीि हैं । जिस निद्रा में वासनाओं का उद्भव न हो या ति…
  6. Verses 7–13जिसमें वासनाओं का सर्वथा क्षय हो जाता है, ऐसी निद्रा "तुर्य शब्द से कही जाती हे, यहाँ पर…
  7. Verse 14पूर्वोक्त पर्वत का जो छोटा-सा गँव है, उसको देखने की इच्छा से प्रतिबद्ध चित्त में बोध की प…
  8. Verse 15मेरी देह का अवस्थापन किसलिए किया जाय, आपकी देह के संसर्ग से यह भी क्यो नहीं जा सकती 2 इस…
  9. Verse 16क्या वरदान की नाई या शाप की नाई आपके वचन से ही मेरा माँसमय शरीर आपके शरीर से सम्बन्ध को प…
  10. Verse 17यदि वस्तु का स्वभाव, जो कि लोकसिद्ध है, विपरीत नहीं हो सकता, तो वासनाओं के क्षीण होने पर…
  11. Verses 18–22जो यहीं पर स्थिति देखी जाती है, ऐसी अवस्था में यह कैसे सम्भव हो सकता है कि एक ही काल में…
  12. Verse 23जैसे मनोरथ से कल्पित पुरुष में जीवन ओर मरण असत्य ही हे । भाव यह कि संकल्पकल्पित पुरुष ही…
  13. Verses 24–26सर्वप्रथम देवीजी अभ्यास का स्वरूप बतलाती है। असंदिग्धरूप से अपनी बुद्धि मे जमाने के लिए उ…
  14. Verse 27दृढ़ वैराग्य आदि उसके लक्षण हैं, यह बात विरक्त पुरुषों की स्तुति द्वारा कहते हैं। म्‌ उसक…
  15. Verse 28कालों में दृश्य के बाध ज्ञान की आवृत्ति भी ब्रह्माभ्यास है, ऐसा कहती है । यह जगत्‌ है, यह…
  16. Verse 29दृश्य प्रपंच के असंभव के ज्ञान से राग, द्वेष आदि का विनाश होने पर मनन से उत्पन्न विद्या क…
  17. Verse 30यह सम्पूर्ण दृश्य मिथ्या है, इस प्रकार के दृढज्ञान से राग आदि का विनाश होने पर ही वह (आत्…
  18. Verses 31–32अभ्यास के हेतुओं का प्रतिपादन कर अब श्रीदेवीजी अभ्यास का फल दिखलाती हुई दो श्लोकों से सर्…
  19. Verse 33वत्से, जैसे शरद्‌ ऋतु में हिम के समान शीतल ओस के सेंक से कुहरा बिलकुल विनष्ट हो जाता है,…